Ara news: बिहार विधानसभा चुनाव से पहले आरा का राजनीतिक माहौल पूरी तरह से गरमा गया है।
दरअसल, आरा सांसद सुदामा प्रसाद ने अपने संसदीय शून्यकाल में रेलवे से अनुदान मांग करते हुए आरा जंक्शन का नाम बदल कर कॉमरेड राम नरेश राम की मांग रख दी।
इसके बाद आरा के लोगों में काफी ही आक्रोश है। लोगों ने सांसद के इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए अपना आक्रोश प्रकट किया।
सोशल मीडिया पर जमकर सांसद सुदामा प्रसाद के इस प्रस्ताव का विरोध किया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर लोगों ने सांसद की आलोचना करते हुए नसीहत दे दी कि “आरा का विकास हो नहीं रहा है और आरा के नाम के साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं।

आरा की सड़कों पर किया गया सांसद का पुतला दहन
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा आरा के सांसद सुदामा प्रसाद का जमकर विरोध किया गया।
सुदामा प्रसाद होश में आओ! मुर्दाबाद के नारे के साथ पुतला दहन करते हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा बताया गया कि सांसद का ये प्रस्ताव निराधार है।
आरा का अपना इतिहास है, आरा माता आरण्य देवी की पावन भूमि है। यहां के इतिहास में बाबू वीर कुंवर सिंह और वशिष्ठ नारायण सिंह गौरव है।
कुछ लोगों ने सुदामा प्रसाद का पर तंज कसते हुए कहा कि सांसद महोदय को अपने पार्टी का नाम माले स्टेशन रखना चाहिए था।
हम आपको बता दें कि आरा स्टेशन का नाम बदलने की ये घटना कोई नई है इसके पहले भी आरा का बदलने का प्रस्ताव आया था।
1942 के आंदोलन में शहीद हुई लसाढी गांव की अकली देवी के नाम पर तत्कालीन रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने ये प्रस्ताव लाया था। उस वक्त भी आरा में इस प्रस्ताव का विरोध जमकर हुआ था।

आइए जानते हैं आरा का नाम आरा कैसे पड़ा
भारतवर्ष में आपको वन देवी का मंदिर दर्जनों मिल जाएंगे लेकिन आरण्य की देवी इकलौती देवी पूरे भारतवर्ष में माता आरण्य देवी ही हैं। जो कि सिर्फ नगर की ही नहीं बल्कि पूरे आरण्य वन की अधिष्ठात्री देवी हैं। वेदों की ऋचाओं में माता आरण्य देवी की महिमा की स्तुति वर्णित है।
त्रेता युग में आरा के क्षेत्र को आरण्य वन के नाम से जाना जाता था। ऐसा माना जाता है जब भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी अपने गुरु विश्वामित्र के साथ अवध से जनकपुर को जा रहे थे तब उन्होंने बहुत सारे जंगलों को पार किया था वो जंगल देवारण्य ,ताड़िका वन ,आरण्य ,सारंग अरण्य ,चम्पारण्य है।
आयोध्या से लेकर बलिया तक का क्षेत्र देवारण्य के अंतरगर्त आता है जिसमें देवरिया ,गोरखपुर अन्य शहर शामिल है। ताड़का वन अर्थात बक्सर से जोड़ा जाता है।
के डर से उस इलाके में कोई जनपथ नहीं था। फिर आता है आरण्य वन।
आरण्य और अरण्य में थोड़ा सा अंतर है अरण्य का मतलब घना जंगल परन्तु आरण्य का अर्थ वैसा जंगल जहां कोई रहता हो।
आरण्यक उपनिषद के अनुसार ” अरण्ये भवम् आरण्यकम् ” अर्थात जो आरण्य में पढ़ाया जाये उसे आरण्यक कहते है।
आरण्यक होने की वजह से यह क्षेत्र आरण्य कहलाया और इसका अपभ्रंश आरा हुआ।
आरा के बारे में ऐसा कहा जाता है की यहां पांडवों ने भी अपना अज्ञात काल बिताया था।
आरा के पास मसाढ़ ग्राम में प्राप्त जैन अभिलेखों में उल्लिखित ‘आरामनगर’ नाम भी इसी नगर के लिए आया है।
बुकानन ने इस नगर के नामकरण में भौगोलिक कारण बताते हुए कहा कि गंगा के दक्षिण ऊँचे स्थान पर स्थित होने के कारण, अर्थात् आड या अरार में होने के कारण, इसका नाम ‘आरा’ पड़ा।
यहां की अधिष्ठात्रि देवी माँ आरण्य देवी है यहां माना जाता है कि जब पांडव वनवास के क्रम में आरा में ठहरे थे।
पांडवों ने आदिशक्ति की पूजा-अर्चना की। मां ने युधिष्ठिर को स्वपन् में संकेत दिया कि वह आरण्य देवी की प्रतिमा स्थापित करे। धर्मराज युधिष्ठिर ने मां आरण्य देवी की स्थापना की थी।